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अंकिता हत्याकांड प्रकरण: नियम अनदेखे कर राजनीति, क्या न्याय को कमजोर करने की तैयारी?

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अंकिता हत्याकांड प्रकरण: नियम अनदेखे कर राजनीति, क्या न्याय को कमजोर करने की तैयारी?

 

 

अंकिता भंडारी प्रकरण को लेकर सोशल मीडिया एवं कुछ माध्यमों पर निरंतर भ्रामक सूचनाएँ, आधे-अधूरे तथ्य एवं निराधार आरोप प्रसारित किए जा रहे हैं। इन्हीं परिस्थितियों के दृष्टिगत उत्तराखण्ड पुलिस द्वारा प्रेस कॉन्फ़्रेंस आयोजित कर पूरे प्रकरण से जुड़े तथ्यों को स्पष्ट किया गया है।
उत्तराखण्ड पुलिस ने स्पष्ट रूप से अवगत कराया है कि अंकिता भंडारी प्रकरण में किसी भी प्रकार का कोई वीआईपी संलिप्त नहीं है। इस तथ्य को माननीय न्यायालय द्वारा भी स्पष्ट रूप से स्वीकार किया जा चुका है। इसके अतिरिक्त, दो व्यक्तियों की कथित बातचीत से संबंधित वायरल ऑडियो को गंभीरता से लेते हुए पुलिस द्वारा तत्काल SIT का गठन किया गया, जो इस विषय में विस्तृत एवं निष्पक्ष जांच कर रही है।
माननीय न्यायालय में प्रस्तुत साक्ष्यों, SIT द्वारा की गई गहन विवेचना एवं उपलब्ध तथ्यों के आधार पर इस प्रकरण में तीनों अभियुक्तों को न्यायालय द्वारा दोषी ठहराते हुए सजा सुनाई जा चुकी है। पुलिस ने यह भी स्पष्ट किया है कि इस मामले में किसी भी प्रकार के साक्ष्य न तो नष्ट किए गए हैं और न ही छिपाए गए हैं। जिस कमरे को लेकर बार-बार यह भ्रम फैलाया गया कि उसे साक्ष्य मिटाने के उद्देश्य से तोड़ा गया, उस कमरे की वीडियोग्राफी सहित समस्त आवश्यक साक्ष्य तीनों न्यायालयों में विधिवत रूप से प्रस्तुत किए गए हैं।
पुलिस द्वारा बताया गया कि प्रारंभिक जांच के दौरान ही कुछ ही घंटों के भीतर सभी आरोपियों की गिरफ्तारी कर ली गई थी, और वे आज भी न्यायिक अभिरक्षा में जेल में निरुद्ध हैं। तथाकथित वीआईपी एंगल सामने आने के पश्चात् पुलिस ने रिसोर्ट/होटल में आने-जाने वाले प्रत्येक व्यक्ति की गहन जांच की। विस्तृत विवेचना में यह तथ्य सामने आया कि जिस प्रकार की अफ़वाहें फैलाई गईं, वैसा कोई वीआईपी इस प्रकरण में शामिल नहीं है।
SIT द्वारा रिसोर्ट में कार्यरत प्रत्येक कर्मचारी से पूछताछ की गई तथा सभी के बयान विधिवत रूप से दर्ज कर न्यायालय में प्रस्तुत किए गए। पुलिस की निष्पक्ष, तथ्यपरक एवं विधिसम्मत जांच का ही परिणाम है कि तीनों अभियुक्त आज भी जेल में हैं।

पुलिस रिमांड के दौरान अभियुक्तों द्वारा यह स्वीकार किया गया कि उन्होंने अंकिता पर “एक्स्ट्रा सर्विस” देने का दबाव बनाया। अंकिता द्वारा इसके लिए सहमति न देने पर आरोपियों द्वारा इस जघन्य अपराध को अंजाम दिया गया। कर्मचारियों से पूछताछ में यह भी पुष्टि हुई कि अंकिता मानसिक रूप से परेशान थी तथा वह वहां से जाना चाहती थी, किंतु आरोपियों द्वारा उसे जबरन अपने साथ ले जाया गया। किसी भी कर्मचारी द्वारा अंकिता के सुरक्षित वापस लौटने की पुष्टि नहीं की गई।

अभियुक्तों द्वारा रिमांड के दौरान बताए गए स्थान की निशानदेही के आधार पर ही शव की बरामदगी की गई, जो पूरी तरह से विधिसम्मत प्रक्रिया के अंतर्गत की गई।

उर्मिला सनावर द्वारा फेसबुक लाइव एवं ऑडियो रिकॉर्डिंग के माध्यम से पूर्व विधायक सुरेश राठौड़ सहित अन्य व्यक्तियों पर लगाए गए आरोपों एवं अंकिता भंडारी प्रकरण से संबंधित कथनों को गंभीरता से लेते हुए पुलिस द्वारा अलग से SIT का गठन किया गया है। इस संबंध में स्पष्ट किया गया है कि उर्मिला सनावर को अब तक गिरफ्तार नहीं किया गया है, बल्कि उन्हें जांच में सहयोग के लिए नोटिस जारी किया गया है, जिसका अभी तक कोई उत्तर प्राप्त नहीं हुआ है।

उर्मिला सनावर द्वारा पुलिस से सुरक्षा की मांग की गई है, परंतु उनके द्वारा प्रस्तुत पत्र में कोई स्पष्ट पता अंकित नहीं है। पुलिस ने उनसे अपील की है कि वे जांच में सहयोग हेतु पुलिस के समक्ष उपस्थित हों। यदि उन्हें किसी भी प्रकार के जान-माल के खतरे की आशंका पाई जाती है, तो उन्हें पूर्ण सुरक्षा प्रदान की जाएगी। वर्तमान में उनके विरुद्ध कोई वारंट जारी नहीं किया गया है।

मार्च 2025 के एक पुराने प्रकरण में उनके विरुद्ध हाल ही में सम्मन जारी हुआ है, जिसका अंकिता भंडारी प्रकरण से कोई संबंध नहीं है।

अंत में, उत्तराखण्ड पुलिस ने मीडिया एवं आम जनता से अपील की है कि यदि इस प्रकरण से संबंधित किसी भी व्यक्ति के पास कोई अतिरिक्त साक्ष्य अथवा जानकारी उपलब्ध है, तो वह आगे आकर पुलिस को उपलब्ध कराए, ताकि सत्य के आधार पर जांच को और अधिक सुदृढ़ किया जा सके।

उत्तराखण्ड पुलिस पुनः यह स्पष्ट करती है कि अंकिता भंडारी प्रकरण की जांच पूर्णतः निष्पक्ष, तथ्यपरक एवं माननीय न्यायालय के निर्देशों के अनुरूप की गई है तथा किसी भी व्यक्ति को बचाने का कोई प्रयास नहीं किया गया है

*न्याय शोर से नहीं, अदालत से मिलता है!*
आज के दौर में जब हर संवेदनशील मामला सोशल मीडिया की सुर्खियों और राजनीतिक बयानबाजी का विषय बन जाता है, तब एक बुनियादी सच्चाई को दोहराना बेहद जरूरी है
गिरफ्तारी न्याय नहीं होती, न्याय फैसला होता है और फैसला केवल अदालत करती है, न कि वायरल ऑडियो, न सड़क का शोर, न टीवी डिबेट और न ही राजनीतिक वक्तव्य।
लोकतंत्र में विरोध, धरना और असहमति का अधिकार सभी को है, लेकिन यह भी उतना ही सच है कि धरना, पुतला दहन और उत्तेजक बयान न्याय का विकल्प नहीं हो सकते। भावनात्मक दबाव में अक्सर सच धुंधला पड़ जाता है और जो मामला अदालत में मजबूती से खड़ा होना चाहिए, वही सार्वजनिक उन्माद के कारण कमजोर हो जाता है।
यह तथ्य अक्सर जानबूझकर नजरअंदाज कर दिया जाता है कि सरकार ने घटना के तुरंत बाद जाँच की ज़िम्मेदारी एक महिला DIG पी. रेणुका को सौंपी थी, जो इस समय CBI में ही कार्यरत हैं।
यह निर्णय अपने आप में इस बात का संकेत था कि जाँच को न केवल संवेदनशीलता बल्कि निष्पक्षता और पेशेवर मानकों के साथ आगे बढ़ाया जाए।
इसके बावजूद यदि यह धारणा बनाई जा रही है कि जाँच एकतरफा या दबाव में की गई, तो यह न केवल तथ्यों से परे है, बल्कि जाँच प्रक्रिया और संस्थाओं की साख पर भी प्रश्नचिह्न खड़ा करने का प्रयास है।
यदि वास्तव में किसी को यह विश्वास है कि आरोपी गलत फँसाए गए हैं या अपराध का दोषी कोई और है, तो इसका एकमात्र सीधा, संवैधानिक और ईमानदार रास्ता न्यायालय है।
अगर विपक्ष को सीबीआई जाँच की माँग करनी है, तो उसके लिए भी अदालत का रास्ता खुला है।
सबूत हैं, तो उन्हें अदालत में प्रस्तुत किया जाए, क्योंकि कानून ऑडियो या वीडियो क्लिप्स पर नहीं, उनके ठोस प्रमाणों, और उसकी सत्यता पर, फॉरेंसिक जांच , आदि के बाद चलता है।

अनुभव और इतिहास दोनों गवाह हैं कि अत्यधिक भड़काऊ राजनीति का नतीजा अक्सर न्याय के विरुद्ध जाता है।
ऐसे मामलों में जेल में बंद लोग तकनीकी आधार पर छूट जाते हैं, जिन पर गंभीर संदेह होता है, वे भी बच निकलते हैं,
और अंततः पीड़ित पक्ष को ही सबसे अधिक नुकसान उठाना पड़ता है।
जब किसी मामले को अदालत की बजाय सड़क और सोशल मीडिया पर लड़ा जाता है, तो कानूनी प्रक्रिया कमज़ोर पड़ती है और न्याय का उद्देश्य पीछे छूट जाता है।
यह समझना आवश्यक है कि न्याय का उद्देश्य किसी राजनीतिक नैरेटिव को गढ़ना नहीं, बल्कि सत्य तक पहुँचना है।
न्याय तभी संभव है जब
जाँच निष्पक्ष हो, सबूत मज़बूत हों, और मामला सही तरीके से अदालत तक पहुँचे।
न्याय शोर से नहीं मिलता।
न्याय तब मिलता है, जब केस मजबूत हो और कानून के रास्ते पर आगे बढ़े।
आज आवश्यकता इस बात की है कि हम सड़क के शोर को अदालत की आवाज़ पर हावी न होने दें, क्योंकि जब शोर जीतता है, तो अक्सर न्याय हार जाता है…..

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By admin

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